डायरी...

आज बैठे बैठे खयाल आया,
चलो अपने आप को ढूंढे।

कैसे और कहा ढूंढे?
चलो डायरी लिखे।

अब डायरी में क्या लिखे...?

सोचने लगा दिल, दौड़ने लगा दिमाग,
अंजान था रास्ता... गुमसुम सा,

तिल तिल चल रहा गाड़ी का पहियाँ,
धीरे-धीरे मिलने लगी अपनी गालियाँ,

शुरुआत हुई सुबह से,
सवेरे सवेरे सूझे खयाल से,

सोचा था-

ये करना है, वो भी करना है,
सारा समय व्यस्त बनाना है।

किंतू...

आया दिन गुजर गया,
शाम को बैठे डायरी लिखने,
आधा समय तो सोचने में ही निकल गया।

फिर लगा की

हाथ कंगन को आरसी क्या
और
पढ़े-लिखे को फ़ारसी क्या...

डायरी लिखना ना अपना धर्म,
बस time पे ख़त्म करो निर्धारित कर्म।

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